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कलाम
अल्लामा इक़बाल
कलाम
नहीं आश्ना मिरे हाल से कोई आँख बज़्म-ए-मजाज़ मेंहूँ वो आईन: जो है ना-तमाम अभी ज़ेहन-ए-आईनः-साज़ में
सीमाब अकबराबादी
कलाम
मिज़ाज-ए-हुस्न में तब्दीलियाँ पैदा नहीं होतींमोहब्बत गा रही है एक ही अफ़्साना बरसों से
सीमाब अकबराबादी
कलाम
बिगड़ना आदमी का और बनना फिर बिगड़ जानाये किस के हाथ में नब्ज़-ए-मिज़ाज-ए-आदमियत है
सीमाब अकबराबादी
कलाम
छीन लो मुझ से दोस्तो ताक़त-ए-’अर्ज़-ए-मुद्दआ'उस ने मिज़ाज-ए-यार को दा’वत-ए-बरहमी भी दी
माहिरउल क़ादरी
कलाम
बरहमी की कोई हद भी ऐ मिज़ाज-ए-ज़ुल्फ़-ए-यारक्या बिगड़ जाने में तो मेरा मुक़द्दर हो गया
बेदम शाह वारसी
कलाम
मरज़-ए-जुदाई-ए-यार ने ये बिगाड़ दी है हमारी ख़ूकि मुआफ़िक़ अपने मिज़ाज के नज़र आती कोई दवा नहीं