क्या बयाँ हो सिफ़त-ओ-शान-ए-रसूल-ए-'अरबी
क्या बयाँ हो सिफ़त-ओ-शान-ए-रसूल-ए-'अरबी
ख़त्म है आप पे सब तर्ह की 'आली-नसबी
ऐसा रुत्बा है कि देख आप को हर एक नबी
यही कहता था ब-सद शौक़-ए-ज़ियारत तलबी
मर्हबा सय्यद-ए-मक्की मदनी अल-'अरबी
दिल-ओ-जाँ बाद फ़िदायत ख़ुश-'अजब ख़ुश-लक़बी
शब-ए-मे'राज ब-फ़रमान-ए-ख़ुदा-ए-दो-जहाँ
हुए आरास्ता सब अर्ज़-ओ-समा बाग़-ए-जिनाँ
अर्श-ओ-कुर्सी को मुज़य्यन किया बा-'अज़्मत-ओ-शान
आए जिब्रईल हुज़ूरी में ये था विर्द-ए-ज़बाँ
मर्हबा सय्यद-ए-मक्की मदनी अल-'अरबी
दिल-ओ-जाँ बाद फ़िदायत ख़ुश-'अजब ख़ुश-लक़बी
शौक़-ए-दीदार मुबारक से मैं हर लैल-ओ-नहार
सूरत-ए-साया पड़ा ख़ाक पे था ज़ार-ओ-नज़ार
मेरे रोने से जो बुराक़-ए-जिनाँ थे बे-ज़ार
मैं दीद-ए-मुबारक में ये कहता हर बार
मर्हबा सय्यद-ए-मक्की मदनी अल-'अरबी
दिल-ओ-जाँ बाद फ़िदायत ख़ुश-'अजब ख़ुश-लक़बी
फ़ज़्ल-ए-ख़ालिक़ से नसीबा मिरा बेदार हुआ
आज हासिल शरफ़-ए-दौलत-ए-दीदार हुआ
मैं तो ज़र्रा था मगर मेहर-ए-पुर-अनवार हुआ
इस सवारी से तफ़ाख़ुर का सज़ा-वार हवा
मर्हबा सय्यद-ए-मक्की मदनी अल-'अरबी
दिल-ओ-जाँ बाद फ़िदायत ख़ुश-'अजब ख़ुश-लक़बी
अब तमन्ना-ए-दिली ये मिरी बाक़ी है हुज़ूर
हश्र जब ख़ल्क़ में करना हो ख़ुदा को मंज़ूर
मैं सवारी में मुशर्रफ़ रहूँ दिन को ज़रूर
ता-क़यामत ग़म-ए-फ़ुर्क़त में रहूँगा रंजूर
मर्हबा सय्यद-ए-मक्की मदनी अल-'अरबी
दिल-ओ-जाँ बाद फ़िदायत ख़ुश-'अजब ख़ुश-लक़बी
उस की तस्कीन जो फ़रमा के चले शाह-ए-अनाम
जा के इक दम से किया बैत-ए-मुक़द्दस में क़याम
अंबिया और रुसुल सब ने किया झुक के सलाम
आ के इक एक ने यूँ दिल का सुनाया पैग़ाम
मर्हबा सय्यद-ए-मक्की मदनी अल-'अरबी
दिल-ओ-जाँ बाद फ़िदायत ख़ुश-'अजब ख़ुश-लक़बी
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