दर-ए-नबी पे ऐ जाने वालो मिरा भी उन से पयाम कहना
दर-ए-नबी पे ऐ जाने वालो मिरा भी उन से पयाम कहना
जो पहुँचो तुम जालियों के आगे दुरूद कहना सलाम कहना
न जाने आएगा कब बुलावा न जाने कब होगी फिर हुज़ूरी
हुज़ूर फ़ुर्क़त में आप की इक तड़प रहा है ग़ुलाम कहना
उठी हैं तैबा की और आँखें कि अश्क उन में मचल रहे हैं
बयान करना मिरी ये हालत ये क़िस्सा-ए-ग़म तमाम कहना
सुना है ख़ुद आप हैं बुलाते सुना है क़िस्मत भी हैं जगाते
हुज़ूर मेरे करम भी जागें कि ख़ुद ही हो इंतिज़ाम कहना
अगर न हो साथ उन की रहमत अगर करम न हो उन का शामिल
न उठ सकूँगा अगर गिरा तो न चल सकूँगा दो-गाम कहना
ब-रोज़-ए-महशर मिले शफ़ा'अत वहाँ पे ढूँडेंगे सब सहारे
मिरे लबों पर रहेगा जारी हुज़ूर का ये नाम कहना
सुना जो ख़ैरात का तो ‘अरसल’ मैं ले के कश्कोल आ गया हूँ
है तेरे इस मय-कदे का चर्चा पिला दो हाथों से जाम कहना
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