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दोहा
विनय मलिका - स्याम घटा घन देखि कै बोलत गहगह मोर
स्याम घटा घन देखि कै बोलत गहगह मोरब्रजबासी तिमि जी उठैं चितवत हरि की ओर
दया बाई
ग़ज़ल
है बला-ए-ना-गहाँ अल्लाह क्या आज़ार-ए-ज़ुल्फ़देखते ही देखते दिल हो गया बीमार-ए-ज़ुल्फ़
अब्दुल्लाह बेदिल
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पद
सुरत की प्रगति - आज घिर आये बादल कारे गरज गरज घन गगन पुकारे
आज घिर आये बादल कारे गरज गरज घन गगन पुकारेरिम-झिम बरसत बूँद अमी की बिजली चमक घट नैन निहारे
शालीग्राम
पद
मध्यस्थ की अनावश्यकता
रिसानी आप मनावो रे प्यारे, विच्च बसीठ न फेर।सौदा अगम है प्रेम का रे, परखत बूझै कोय।
आनंद घन
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दीदम बला-ए-ना-गहाँ आशिक़ शुदम दीवानः हमजानम ब-जाँ आमद हमी अज़ ख़्वेश व अज़ बेगान: हम
अमीर ख़ुसरौ
ग़ज़ल
शब-ए-असरा नक़ाब उट्ठा जो रुख़ से ना-गहाँ तेरातो ज़ाहिर हो गया 'आलम पे राज़-ए-कुन-फ़काँ तेरा
क़ातिल अजमेरी
दोहा
एक सखी ऐसे कहियो वे आये घन लाल
एक सखी ऐसे कह्यो वे आये घन लालउझकि बाल झुकि कैं लखै अति दुख भयो 'जमाल'
जमाल
पद
विरह के पद - हरी बिना ना सरे री माई मेरा प्राण निकस्या जात हरी बिन न सरे री माई
तनक जल बाहर कीना तुरत मर जाईकान लकरी बन परी काठ घुन खाई
मीराबाई
ग़ज़ल
सज्दा करते थे जहाँ वो सज्दा-गाहें छोड़ दींतेरे पीछे चल पड़े तो अपनी राहें छोड़ दीं
