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ग़ज़ल
'इश्क़ का मैं पिया है जाम 'अक़्ल कहाँ और मैं कहाँदूर हुआ है नंग-ओ-नाम 'अक़्ल कहाँ और मैं कहाँ
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
क़िता'
वो निगाह-ए-मस्त की गर्दिशें कि हज़ार जाम निसार होंवही दौर बादा-ए-बे-सुबू तुम्हें याद हो कि न याद हो
आरिफ़ बलियावी
ग़ज़ल
हिकमत से ये ख़ाली नहीं लबरेज़ साक़ी जाम करदौर-ओ-तसलसुल में न फँस दीवानगी में नाम कर
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
ना'त-ओ-मनक़बत
हम हुए सैराब 'इश्क़-ए-मुस्तफ़ा के जाम सेइस लिए वाबस्तगी अपनी है ख़ास-ओ-'आम से

