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कलाम
निकहत से तिरी ज़ुल्फ़ की हो जाता हूँ बे-ख़ुद'आलम में मेरे दिल के लिए दाम यही है
शाह इनायातुलाह सफ़ीपुरी
कलाम
गुलिस्तान-ए-जहाँ है मेरे दम से ख़ुल्द-ए-नज़ारागुलों की ताज़गी हूँ मैं हुजूम-ए-रंग-ए-निकहत हूँ
धर्म सरूप
कलाम
न छेड़ ऐ निकहत-ए-बाद-ए-बहारी राह लग अपनीतुझे अटखेलियाँ सूझी हैं हम बे-ज़ार बैठे हैं