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कलाम
उसे मा'लूम है 'महशर' वो क्या पूछे सर-ए-महशरतु जिस से मुल्तजी है वो ही तेरा मुल्तजा भी है
महशर आरफ़ी
कलाम
नज़र में वादी-ए-ऐमन का नक़्शा फिरने लगता हैशब-ए-’उर्स आज है वतन-ए-चराग़ाँ देखते जाओ
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
रहूँ कहीं भी फ़क़ीर बन कर मुझे ख़याल-ए-'फ़ना' नहींतिरी निगाह-ए-करम ने मुझ को सदा पयाम-ए-बक़ा दीया
फ़ना बुलंदशहरी
कलाम
ग़रीब दर-दर भटक रहे थे कहीं न हम को सुकूँ मिलाबना के अपना फ़क़ीर मुझ को ग़म-ए-जहाँ से छुड़ा दिया
अज्ञात
कलाम
ख़ुदा जाने ये किस शहर अंदर हमन को लादे डाला हैन दिलबर है न साक़ी है न शीशा है न पियाला है
पंडित चंद्रभान ब्राह्मण
कलाम
कोई मुश्किल था महशर में तुम्हें क़ातिल बना देनामगर कुछ सोच कर रहम आ गया जाओ दु'आ देना
क़मर जलालवी
कलाम
वफ़ा कैसी कहाँ का 'इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरातो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यूँ हो