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गुलाल साहब

गाज़ीपुर, भारत

गुलाल साहब

दोहा 4

गूदर धागा नाम का सूई पवन चलाय

मन मानिक मनि गन लग्यो पहिर 'गुलाल' बनाय

गुलाल ताखी तत्त दियो प्रेम सेल्हि हिये नाय

सुमिरिनी मन महँ फिरयो आठ पहर लौ लाय

'गुलाल' माला नाम का राखो गर में नाय

कोटि जतन छूटे नहीं रहो जोति लपटाय

माला जपों मंतर पढ़ों मन मानिक को प्रेम

कंथ गूदरि पहिरौं नहीं कह 'गुलाल' मेरे नेम

शबद 16

रेख़्ता 1

 

मंगल 2

 

होरी 3

 

अरिल्ल 38

कृष्ण भक्ति संत काव्य 1

 

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