एक तरह से देखें तो खुदा और इंसान दोनों एक-दूसरे पर मबनी हैं। क्योंकि तजल्ली को ज़ाहिर करने के लिए इंसान की ज़रूरत है और इंसान खुदा पर मुन्हसिर है, क्योंकि ख़ुदा के बिना इंसान ख़ुद कुछ भी नहीं है।
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तसव्वुफ़, ख़ुदा के गुणों को अपनाने का नाम है।
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न तो कोई पर्दा है और न कोई हिजाब। वो ख़ुद अपने जलवे से छिपा हुआ है। कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे न देखा जा सके। जिसे नहीं देखा जा सकता, उस के पीछे ला-इल्मी है।
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'फ़ना' बस अपनी अंदरूनी ज़ात को पहचानने और ख़ुदा के साथ 'एक होने' (तौहीद) को समझने का एक तरीक़ा है। यह इंसान को जहालत की क़ैद से आज़ाद करता है।
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वो है और उस के साथ न कोई पहले है न बाद में, न ऊपर है और न नीचे। न ही दूर है और न क़रीब। न ही विसाल, न फ़िराक़। न वो कैसा है, न वो कहाँ हैं, न कोई जगह है। वह अब भी वैसा ही है, जैसा वो था। वह बग़ैर वहदत के भी एक है और बग़ैर फ़र्दियत के भी अकेला।
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