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सुल्तान बाहू

1630 - 1691 | शोरकोट, पाकिस्तान

पंजाबी और फ़ारसी ज़बान के मा’रूफ़ सूफ़ी शाई’र

पंजाबी और फ़ारसी ज़बान के मा’रूफ़ सूफ़ी शाई’र

सुल्तान बाहू

शे'र 15

कलाम 86

बैत 1

 

सूफ़ी उद्धरण 29

अगर किसी का एक भी अमल शरीअत के ख़िलाफ़ है, तो वह सूफ़ी नहीं, बल्कि शैतान है। उस से दूर रहना चाहिए।

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दान करने से ख़ुदा के बंदों का हक़ अदा होता है और पता चलता है कि अमीर लोगों को ख़ुदा के मुक़ाबले माल से कहाँ तक मोहब्बत है।

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पीरी और मुर्शिदी कोई मामूली काम नहीं है, वो एक राज़-ओ-नियाज़ और सिर्र-ओ-असरार है।

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दुनिया के लोग - दुनिया और माल-ओ-दौलत के ग़ुलाम है और ये सब ख़ुदा के फ़क़ीर के ग़ुलाम हैं।

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फ़िक्र-ओ-मा’रिफ़त - ख़ुदाई दरिया की लहरे हैं और दानशीलता करम ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं, जो ख़ुदा से मिलाती हैं।

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