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अबू अली अहमद रूदबरी

850-70 - 933-40 | मिस्र

अबू अली अहमद रूदबरी

सूफ़ी उद्धरण 22

ख़ौफ़ और उम्मीद परिंदे के दो परों की तरह हैं। जब ये दोनों बराबर होते हैं, तो परिंदा उड़ता रहता है। जब इन में से एक कम हो जाता है, तो परिंदा उड़ नहीं पाता। जब ख़ौफ़ उम्मीद, दोनों ख़त्म हो जाते हैं, तो परिंदा गिर कर मर जाता है।

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अगर तुम्हें महबूब के दर से दुत्कार दिया जाए और तुम तब भी वहीं पड़े रहो, यही तसव्वुफ़ है।

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अगर पाँच दिनों के बाद दरवेश कहे मैं भूखा हूँ तो उसे बाज़ार भेजो और कहो कि जा कर कमाए।

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तसव्वुफ़ ये है कि रस्म-ओ-रिवाज को तर्क करना, एक सधी हुई इबादत करना और दिखाने की शान-ओ-शौक़त को छोड़ देना।

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महबूब की ख़्वाहिशात के मुताबिक़ होना ही मुहब्बत है।

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