अख़तर वारसी के अशआर
छुप इस तरह कि तिरा अक्स भी दिखाई न दे
तिरी सदा तिरी आवाज़ भी सुनाई न दे
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इस आरज़ू से हज़र ख़ू-ए-ज़िंदगी से हज़र
जो ताब-ओ-ताक़त-ए-इज़्हार-ए-लब-कुशाई न दे
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मुझ से न अब हक़ीक़त-ए-ता'बीर पूछिए
वस्ल-ए-सनम के नक़्श नज़र आए ख़्वाब में
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere