अज़ल में जो सदा मैं ने सुनी थी कैफ़-ए-मस्ती में राजु मुर्ली
क्यूँ न अश्क-बार हुआ करूँ क्यूँ न बे-क़रार रहा करूँ हाजी महबूब अ'ली
जो राह-ए-’इश्क़ में गुम हो गया है नुसरत फ़तेह अली ख़ान
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राजु मुर्ली
अज़ल में जो सदा मैं ने सुनी थी कैफ़-ए-मस्ती में राजु मुर्ली
क्यूँ न अश्क-बार हुआ करूँ क्यूँ न बे-क़रार रहा करूँ हाजी महबूब अ'ली
जो राह-ए-’इश्क़ में गुम हो गया है नुसरत फ़तेह अली ख़ान
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