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ख़्वाजा बंदानवाज़ गेसूदराज़

1321 - 1422 | गुलबर्ग, भारत

ख़्वाजा बंदानवाज़ गेसूदराज़

दकनी सूफ़ी काव्य 8

फ़ारसी सूफ़ी काव्य 5

 

रूबाई 1

 

सूफ़ी उद्धरण 42

अगर शैख़ अपने मुरीद को किसी ख़ास काम का हुक्म दो, तो इसे बड़ी रहमत जाने। रफ़्तार, गुफ़्तार और दस्तार में अपने पीर की पैरवी बेहतर जाने और अक्सर पीर का नाम विर्द-ए-ज़बाँ रखे। पीर के तसव्वुर के लिए कोई वक़्त मुअय्यन करे, बल्कि एक लम्हा भी उस के तसव्वुर से ख़ाली रहे।

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तुम जिस मक़ाम पर भी पहुँचो, मगर पीर की सोहबत तर्क करो।

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मुरीद पीर परस्त होना चाहिए। इस का मतलब है कि पीर जो अनवार-ए-लाहूती का मज़हर है, तो ये उस की परस्तिश नहीं है, बल्कि हक़ की परस्तिश है।

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सालिक को लाज़िम है कि

अपने और दूसरों के तमाम ह़ुक़ूक अदा करे, इस में मुतलक़ और ग़ुस्सा हो। वो किसी दूसरे के अच्छे-बुरे से वास्ता रखे। उस के दिल में जितनी हवस हो, उस को दूर करे। अगर दूर हो, तो रियाज़त और मुशाहिदा करता रहे।

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हर चीज़ में एक मुसीबत छिपी होती है, मगर आशिक़ाना मुहब्बत में दो मुसीबतें होती हैं, एक आग़ाज़ में और दूसरी अंजाम पर।

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पुस्तकें 7

 

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