अगर शैख़ अपने मुरीद को किसी ख़ास काम का हुक्म दो, तो इसे बड़ी रहमत जाने। रफ़्तार, गुफ़्तार और दस्तार में अपने पीर की पैरवी बेहतर जाने और अक्सर पीर का नाम विर्द-ए-ज़बाँ रखे। पीर के तसव्वुर के लिए कोई वक़्त मुअय्यन न करे, बल्कि एक लम्हा भी उस के तसव्वुर से ख़ाली न रहे।