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मशरिक़ी मनेरी

1866 - 1925 | मनेर शरिफ़, भारत

मनेर शरीफ़ का एक अ’ज़ीम शाइ’र

मनेर शरीफ़ का एक अ’ज़ीम शाइ’र

मशरिक़ी मनेरी के अशआर

तरीक़-ए-इ’श्क़ में रहबर है अपनी ख़ामोशी

जरस का काम नहीं मेरे कारवाँ के लिए

क्यूँ 'मशरिक़ी'-ए-गमज़दा का दिल हो बेचैन

अब क़ब्र की है जान जो जानाना-ए-दिल था

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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