मशरिक़ी मनेरी के अशआर
तरीक़-ए-इ’श्क़ में रहबर है अपनी ख़ामोशी
जरस का काम नहीं मेरे कारवाँ के लिए
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क्यूँ 'मशरिक़ी'-ए-गमज़दा का दिल न हो बेचैन
अब क़ब्र की है जान जो जानाना-ए-दिल था
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere