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शम्स तबरेज़

1185 - 1248 | तबरिज़, ईरान

शम्स तबरेज़ का परिचय

शम्स तबरेज़ मौलाना रूमी के आध्यात्मिक गुरु थे| रूमी ने अपने दीवान का नाम दीवान-ए-शम्स रखकर इन्हें अमर कर दिया| रूमी की कविताओं में जगह-जगह शम्स का नाम आता है और उनकी लेखनी के कौशल के पीछे शम्स की ही प्रेरणा थी| कहते हैं दमिश्क़ जाने से पहले शम्स ने अपने सबसे प्यारे शिष्य रूमी को कोन्या में चालीस दिनों तक आध्यात्मिक शिक्षा दी थी| रूमी से शम्स की पहली मुलाक़ात का क़िस्सा बड़ा दिलचस्प है| १५ नवंबर १२४४ को काले पैरहन पहने एक शख्स कोन्या में दाख़िल हुआ और वहां के व्यापारियों में घुल मिल गया| उसे कोन्या में ऐसी चीज़ की तलाश थी जो सिर्फ़ यहीं मिलती थी, अंत में उन्हें घोड़े पर सवार रूमी मिले| एक दिन रूमी किताबों का ढेर लगाए कुछ पढ़ रहे थे| संयोगवश वहां से शम्स का गुजरना हुआ| शम्स ने रूमी से पूछा - तुम क्या पढ़ रहे हो ? रूमी ने उत्तर दिया - मैं जो पढ़ रहा हूँ वो तुम्हारी समझ में नहीं आएगा| यह सुनकर शम्स ने एक पुरानी और नायब किताब उठायी और बगल में पानी के एक हौज़ में फ़ेंक दी| रूमी ने जल्दी से कूदकर उस किताब को बाहर निकला, पर निकलने के बाद उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि किताब पूरी तरह सूखी हुई है और उसपर पानी कि एक बूंद नहीं है| जब रूमी ने शम्स से पूछा ये क्या है ? शम्स ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया - मौलाना ये तुम्हारी समझ में नहीं आएगा | इन दोनों गुरु-शिष्यों का प्रेम एक मिसाल बन गया| कुछ साल कोन्या में बिताने के बाद शम्स खोय चले गए | शम्स कुछ सालों बाद ही आश्चर्यजनक तरीके से ग़ायब हो गए | कहते हैं रूमी के अपने मुरीद ही शम्स और रूमी की दोस्ती से जलने लगे थे और उन्होंने ही साजिश करके शम्स की हत्या करवा दी|
इनकी एक रचना मक़ालत-ए-शम्स तबरेज़ी मिलती है जिनमे इनके उपदेश हैं |

 

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