शीरीं लखनवी के अशआर
रो के फ़रमाते हैं वो शब को जो हम याद आए
गोशा-ए-क़ब्र में सोते हैं जगाने वाले
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere