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यह्या बिन मुआज़

830 - 871 | बल्ख़, अफ़गानिस्तान

यह्या बिन मुआज़

सूफ़ी उद्धरण 50

दिल! उस के पास बैठ, जो दिल का हाल जानता हो। उस दरख़्त के नीचे बैठ, जिस पर ताज़ा फूल खिले हों।

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ख़ुदा के वली ज़मीन पर एक ख़ुशबूदार पौधे की मानिंद हैं। सच्चे दिल वाले, उन की ख़ुशबू को अपने दिलों में समेट लेते हैं और उन के दिल महबूब के लिए तड़पने लगते हैं। फिर वो अपनी फ़ितरत के मुताबिक़ इबादत में इज़ाफ़ा करते हैं।

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जिस चीज़ से तुम्हें दुख होता है, वही तुम्हें बरकत भी देती है। अँधेरा ही तुम्हारा चराग़ है।

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जो कुछ भी तुम्हें अज़ीज़ है, उसी की ख़ूबसूरती को अमल का आईना बना लो।

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मुहब्बत, ख़ास चीज़ माँगती है। उसे ख़ुद को वार देने वाली क़ुर्बानी चाहिए। मुहब्बत की इन्हीं लहरों से आसमानों का निज़ाम चलता है। अगर मुहब्बत होती, तो दुनिया मुर्दे की तरह की पड़ी होती।

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