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सूफ़ी उद्धरण
झूठ एक ऐसे ज़ख़्म की तरह है, जो आहिस्ता-आहिस्ता अच्छे कामों को निगल जाता है।
झूठ एक ऐसे ज़ख़्म की तरह है, जो आहिस्ता-आहिस्ता अच्छे कामों को निगल जाता है।
शाह सिकंदर क़ादरी कैथली
शे'र
किया जो मुझ तरफ़ गुल-रू नज़र आहिस्ता आहिस्तावो पहुँची बुलबुल-ए-दिल कूँ ख़बर आहिस्ता आहिस्ता
तुराब अली दकनी
कलाम
चला आहिस्ता-आहिस्ता तिरे कलिमा से दम मेरानज़्अ' में कैसे भूलूँ है वज़ीफ़ा दम-बदम मेरा
मोहम्मद बादशाह क़दीर
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ग़ज़ल
ज़रा आहिस्ता ले चल कारवान-ए-शे'र 'हाफ़िज़' कोकि सतह-ए-ज़ेहन-ए-शागिर्दान-ए-नाहमवार है साक़ी
महमूद आलम
सूफ़ी कहानी
कहानी -22-ज़िन्दगी- गुलिस्तान-ए-सा’दी
तेज़ चलने वाला घोड़ा दौड़ में थक जाता है और आहिस्ता-आहिस्ता चलने वाला ऊँट मंज़िल पर जा पहुँचता है।
सादी शीराज़ी
ग़ज़ल
मोहब्बत तुझ को आदाब-ए-मोहब्बत ख़ुद सिखा देगीज़रा आहिस्ता-आहिस्ता इधर रुज्हान पैदा कर
आज़ाद सहारनपुरी
शे'र
अदब से सर झुका कर क़ासिद उस के रू-ब-रू जानानिहायत शौक़ से कहना पयाम आहिस्ता आहिस्ता
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
ना'त-ओ-मनक़बत
ज़रा ये नाज़ की बातें 'शकील' आहिस्ता-आहिस्तान जाने क्या कह दे न जाने कोई क्या सुन ले
शकील बदायूँनी
ग़ज़ल
लब-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर हिलते हैं कुछ आहिस्ता-आहिस्तापड़े हैं वार ओछे है शिकायत दस्त-ए-क़ातिल से
क़ैस गयावी
व्यंग्य
मुल्ला नसरुद्दीन- तीसरी दास्तान
तक़दीर और सुनहरे मौक़े सिर्फ़ उसी शख़्स की मदद करने आते हैं जो पूरे यक़ीन के
लियोनिद सोलोवयेव
सूफ़ी कहानी
कहानी -8-ज़िन्दगी- गुलिस्तान-ए-सा’दी
दो आदमियों के बीच आग भड़काना और ख़ुद को बीच में, जला लेना अ’क़्ल की बात
सादी शीराज़ी
सूफ़ी कहानी
ई’सा का अहमक़ों से दूर भागना - दफ़्तर-ए-सेउम
ऐ शख़्स तू भी हज़रत-ए-ई’सा की तरह अहमक़ों से दूर भाग, नादान की सोहबत ने बड़े
रूमी
सूफ़ी लेख
हज़रत ग़ौस ग्वालियरी और योग पर उनकी किताब "बह्र-उल-हयात"
जब कोई ज़िक्र-ए-कुम्भक शुरू करना चाहे तो वह जिस्म के आ’ज़ा पर मौजूद हवा को पूरक
सुमन मिश्र
सूफ़ी लेख
उ’र्स-ए-बिहार शरीफ़
हज़रत का वा’ज़जुमआ’ के दिन हज़रत क़िब्ला का जामा’ मस्जिद में स़ूफियाना वा’ज़ था।हज़रत ने अपने