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सलोक
अज्ञान- अन्धनि खे अटिकल, कान्हे ताडि तरण जी।
लहजे मझि लघे पिया, के सुजागा सबल।सामी सभ महल, हाजुर दिसनि हजूर खे।।
सामी
ना'त-ओ-मनक़बत
एक लफ़्ज़ से हो जाएँगे ज़ालिम तेरे टुकड़ेज़ैनब मुझे कहते है मैं लहजे में अली हूँ
फ़ैज़ान शैख़ क़ैस
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ना'त-ओ-मनक़बत
ऐ काश कि फिर गूँजे दरबार-ए-मोहम्मद मेंहस्सान के लहजे में नग़्मात मदीने में
सय्यद हसन अहमद
ना'त-ओ-मनक़बत
मनाक़िब मुनफ़रिद लहजे में नुदरत ख़ुश मक़ाली भीनवाज़ा फ़िक्र को मेरी ख़ुदा ने कैसी राहत से
साक़िब ख़ैराबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
शब-ए-मे'राज के लहजे में जो तू बात करेसुनने वाला तिरी आवाज़ का शश्दर हो जाए
अख़्तर महमूद वारसी
ग़ज़ल
नाम है 'इक़बाल' मेरा और उसी का है असरहो भला क्यूँ मेरे लहजे से ये शिकवा ख़त्म-शुद
इक़बाल अशरफ़ सिमनानी
नज़्म
मेरा रसूल
जिस की कमली के साए में आँख सहर ने खोलीजिस के लहजे में हम तक पहुँची क़ुदरत की बोली
मुज़फ़्फ़र वारसी
व्यंग्य
मुल्ला नसरुद्दीन- तीसरी दास्तान
शिकायती लहजे में वह बोलाः "अबे, काफ़िर की औलाद! मैं ऐसा गला कहां से लाऊं? आख़िर,
लियोनिद सोलोवयेव
सूफ़ी लेख
बिहार के प्रसिद्ध सूफ़ी शाइर – शाह अकबर दानापुरी
इस दौरान अपने पीर-ओ-मुर्शिद से बहुत दूर हो गए। जब ज़िंदगी ढलने लगी तो आवाज़ भी