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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
पंद-ए-'हसन' ईनस्त अगर गोश बदारीऐ तालिब-ए-फ़िरदौस ब-रौ सू-ए-मोहम्मद
अमीर हसन अला सिज्ज़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
बे-दिली ने मुझ को 'बेदिल' 'अर्श तक पहुँचा दियापहले दिल था जिस जगह अब है वहाँ तस्वीर-ए-शैख़
अब्दुल्लाह बेदिल
शे'र
बुलबुल सिफ़त ऐ गुल-बदन इस बाग़ में हर सुब्हतेरी बहारिस्तान का दीवाना हूँ दीवाना हूँ
क़ादिर बख़्श बेदिल
ना'त-ओ-मनक़बत
क्यूँ न हो दिल लोट उन पर क्यूँ न हो 'बेदिल' निसारआज वो अरमान-ए-ख़ालिक़ जान-ए-जाँ पैदा हुए
अब्दुल्लाह बेदिल
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ना'त-ओ-मनक़बत
मुरादें होंगी पूरी सब तुम्हारी बिल-यक़ीं 'बेदिल'कि हाँ तुम पर इनायत है जनाब-ए-ग़ौस-ए-आ'ज़म की
अब्दुल्लाह बेदिल
ग़ज़ल
निकालूँ किस तरह दिल से मैं अपनी हसरतें 'बेदिल'मेरे ताबूत-ए-अरमाँ पर यही हैं नौहा-ख़्वाँ मेरी
अब्दुल्लाह बेदिल
ना'त-ओ-मनक़बत
ब-जुज़ 'इश्क़-ओ-मोहब्बत और क्या है शग़्ल ऐ 'बेदिल'हुआ हूँ 'आशिक़-ए-शैदा हमीदुद्दीन सूफ़ी का
अब्दुल्लाह बेदिल
ग़ज़ल
जहाँ में 'आशिक़-ओ-मा'शूक़ निकले दोनों ला-सानीन 'बेदिल' सा कोई शैदा न तुझ-सा दिलरुबा देखा
अब्दुल्लाह बेदिल
ग़ज़ल
लूटेगा सब बहार तिरी शहनः-ए-ख़िज़ाँबुलबुल पर कर ले तू ज़र-ए-गुल को निसार शाख़
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
अनवार-ए-तजल्ली-ए-मोहम्मद 'अली-'अलीअसरार-ए-मा’नवी-ए-मोहम्मद 'अली-'अली