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ग़ज़ल
चुभे जब दिल में ख़ार-ए-इ'श्क़ फिर कमतर निकलते हैंनिकलते हैं अगर तो जान ही ले कर निकलते हैं
आफ़ाक़ बनारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
'इश्क़ में 'लुत्फ' जो तू उस से न कमतर होतातेरा मरक़द भी शहीदी के बराबर होता
लुत्फ़ बरेलवी
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ना'त-ओ-मनक़बत
कमतर
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
चू कुल अज़ रू-ए-ज़ाहिर हस्त बिसयारबूवद अज़ जुज़्व-ए-ख़ुद कमतर ब-मिक़दार
महमूद शबिस्तरी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
कमतर अज़ ज़र्रः नई पस्त म-शौ मेहर ब-वर्ज़ता-ब-ख़िल्वत-गह-ए-ख़ुर्शीद रसी चर्ख़-ज़नाँ
हाफ़िज़
ना'त-ओ-मनक़बत
रात-दिन 'इश्क़-ए-हबीब-ए-किब्रिया है जल्वा-गर'अर्श से कमतर नहीं है दिल हमारा इन दिनों
लुत्फ़ बरेलवी
ना'त-ओ-मनक़बत
मैं तेरा बंदा-ए-कमतर तु मेरा ख़ालिक़-ए-‘अकबर’तिरी यकताई का करता हूँ मैं इक़रार या अल्लाह
