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सूफ़ी उद्धरण
ओ कबीर! दरवेश की सोहबत में ख़ुदा याद आता है, यही लम्हे काम के हैं बाक़ी सब बेकार।
ओ कबीर! दरवेश की सोहबत में ख़ुदा याद आता है, यही लम्हे काम के हैं बाक़ी सब बेकार।
गुरु नानक
ग़ज़ल
ये हिज्र ये लम्हे फ़ुर्क़त के इस तौर हमें तड़पाएँ तोइस आग में जलते जलते हम ऐ यार कहीं जल जाएँ तो
सूफ़िया दीपिका कौसर
ग़ज़ल
तुरफ़ा क़ुरैशी
ना'त-ओ-मनक़बत
चला लिखने मैं जिस लम्हा तो सोचा क्या चमकता हैक़लम ने लिख दिया नूर-ए-शह-ए-बतहा चमकता है
शादाब रज़ा रहमती
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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
रूमी
मसनवी
बयान-ए-आँकि ईं इख़्तिलाफ़ात दर सूरत-ए-रविश अस्त ने दर हक़ीक़त-ए-राहऊ ज़ यक रंगी-ए-'ईसा बू न-दाश्त
रूमी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
हर आँ-चे दर नज़र आयद जमाल-ए-यार दर उस्तहर आँ-चे मी-निग्रम मन कमाल-ए-यार दर उस्त
अहमद जाम
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
सर्वे चू तू दर उच्च व दर तत्तः न-बाशदगुल मिस्ल-ए-रुख़-ए-ख़ूब-ए-तू अलबत्त: न-बाशद
अमीर ख़ुसरौ
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दर गह-ए-ख़ल्क़ हम: ज़र्क़-ओ-फ़रेबस्त-ओ-हवसकार दरगाह-ए-ख़़ुदावंद-ए-जहाँ दारद-ओ-बस
हकीम सनाई
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
शाह रा ख़्वाही कि बीनी ख़ाक शो दरगाह राज़े-आबरू आबी ब-ज़न दरगाह-ए-शाहंशाह रा



