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ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

1751 - 1824

18वीं सदी के बड़े शायरों में शामिल, मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन।

18वीं सदी के बड़े शायरों में शामिल, मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन।

ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी के अशआर

शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान

चाँद और तारे लिए फिरते हैं अफ़्शाँ हाथ में

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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