ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी के अशआर
शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान
चाँद और तारे लिए फिरते हैं अफ़्शाँ हाथ में
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere