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अबुल हसन ख़रक़ानी

963 - 1033 | सेमनान, ईरान

अबुल हसन ख़रक़ानी

फ़ारसी सूफ़ी काव्य 1

 

सूफ़ी उद्धरण 46

जिसे ख़ुदा हिदायत दे, उस के लिए रास्ता मुख़्तसर कर दिया जाता है।

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खुदा अपना ग़म उस शख़्स पर नाज़िल करता है, जो रौशनदिल होता है।

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यह पर्दे ही हैं जो माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल के वक़्त को तुम्हारी नज़रों से छुपा देते हैं। जब यह पर्दे हटा दिए जाएँ, तो सब कुछ नज़र आता है।

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सूफ़ी को सूरज की रौशनी की ज़रूरत है और चाँदनी की, क्योंकि रब की फ़ितरत उस के साथ है और रब की फ़ितरत तमाम सितारों से भी ज़्यादा रौशन है।

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सब से बड़ी इबादत ख़ुदा का ज़िक्र और याद है। इस के बाद ज़िन्दगी की पाकीज़गी, सदक़़ा और ज़ुह्द आते हैं।

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