अख़तर वारसी के अशआर
वो ज़ुल्मतें हैं रह-ए-ज़ीस्त में क़दम-ब-क़दम
चराग़-ए-दिल भी जलाएँ तो कुछ सुझाई न दे
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टैग : चराग़
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere