अमजद हैदराबादी के अशआर
इक आफ़ताब-ए-वहदत है जल्वा-बख़श-ए-कसरत
निकली हुई हैं गलियाँ सदहा तिरी गली में
-
टैग : आफ़ताब
-
शेयर कीजिए
- सुझाव
- प्रतिक्रिया
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere