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ग़ौस अली शाह

1804 - 1880 | पानीपत, भारत

ग़ौस अली शाह

सूफ़ी उद्धरण 12

जब ख़ुदा साथ हो गया, तो फिर किसी दूसरे मददगार की कोई ज़रूरत नहीं।

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जिस वक़्त तजल्ली-ए-ज़ात होती है, हर तरह से तौहीद और एकत्व के राज़ खुलते हैं।

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दुनिया और उस के तमाम ऐश तुच्छ हैं, इस की ख़त्म हो जाने वाली चमक-धमक पर आशिक़ होना, ज़िंदगी से हाथ धोना है।

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दुनिया मुर्दा है और उस की चाह रखने वाले कुत्तों की तरह हैं।

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हर शख़्स ने अपनी ख़्वाहिशात के हिसाब से अलग क़िब्ला बना रखा है और उसी में डूबा हुआ है।

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