ग़ौस अली शाह के सूफ़ी उद्धरण
हर शख़्स ने अपनी ख़्वाहिशात के हिसाब से अलग क़िब्ला बना रखा है और उसी में डूबा हुआ है।
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जिस वक़्त तजल्ली-ए-ज़ात होती है, हर तरह से तौहीद और एकत्व के राज़ खुलते हैं।
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दुनिया और उस के तमाम ऐश तुच्छ हैं, इस की ख़त्म हो जाने वाली चमक-धमक पर आशिक़ होना, ज़िंदगी से हाथ धोना है।
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दिल की सफ़ाई बग़ैर इबादत के हासिल नहीं होती और ख़ुदा का नूर चेहरे पर बिना दिल की सफ़ाई के नहीं दिखता।
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सब्र भले ही कड़वा सही, लेकिन उस का फल मीठा है। इस की तस्दीक़ बड़े तजरिबे से हो चुकी है।
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दुनियावी दौलत और ख़ूबसूरती पर फ़ख़्र करना बेकार है। ये जल्दी ही ज़वाल का शिकार होने वाली चीज़ें हैं।
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere