मिरे दिल को शौक़-ए-फ़ुग़ाँ नहीं मिरे लब तक आई दु'आ नहीं मुबारक अली
ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते आबिदा परवीन
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अज्ञात
तिरी ज़ुल्फ़ों ने बल-खाया तो होता अज्ञात
मिरे दिल को शौक़-ए-फ़ुग़ाँ नहीं मिरे लब तक आई दु'आ नहीं मुबारक अली
ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते आबिदा परवीन
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