ख़्वाजा हैदर अली आतिश के अशआर
शैदा-ए-रू-ए-गुल न हैं शैदा-ए-क़द्द-ए-सर्व
सय्याद के शिकार हैं इस बोसताँ में हम
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कू-ब-कू फिरता हूँ मैं ख़ाना-ख़राबों की तरह
जैसे सौदे का तेरे सर में मेरे घर हो गया
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere