ख़ुदा की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं किया जा सकता, फिर भी वो इंसान की आज़ादी के इरादे को तस्लीम करता है। इंसान अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ महदूद मानी में अमल करने के लिए आज़ाद है।
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जब महबूब का कोई निशां न रहे, तो तुम भी बे-निशाँ हो जाओ और फूल की ख़ुशबू की तरह फूल ही में छुप जाओ और उसी जैसे नज़र आओ।
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तमाम इंसान एक जैसी फ़ितरत के मालिक नहीं होते, कुछ लोगों की रूह दूसरों से बेहतर और ज़्यादा कामिल होती हैं और वो लोग अपनी सलाहियतों और ख़्वाहिशात के मुताबिक़ अपने काम को अंजाम देती हैं।
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दरअस्ल, इंसान न तो पूरी तरह से आज़ाद है और न ही पूरी तरह से मजबूर। तमाम इंसानों की तखलीक़ खुदा की मर्ज़ी पर मुन्हसिर है, लेकिन वे अपना रास्ता चुनने के लिए आज़ाद हैं।
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सालिक को फ़ना की हालत में हक़ीक़त का पता चलता है। इस हालत में पाक ज़ात का इल्म ज़ाहिर होता है। दूसरे अल्फ़ाज़ में कहा जाए तो आरिफ़ ख़ुदा को तब पहचानता है, जब वो ख़ुद से ज़ुदा हो जाता है।
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