शाह काज़िम क़लंदर के अशआर
सुध कब रहत मोहन के देखत
चित कहाँ ठहरत आँख लगाय
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आँख खोल दिखते 'काज़िम' काँ
उठ गरे लागो कँवर कन्हाई
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere