शाह तक़ी राज़ बरेलवी के अशआर
ख़ुदा शाहिद है इस शम्‘अ-ए-फ़रौज़ाँ की ज़िया तुम हो
मैं हरगिज़ ये नहीं कहता तुमहें मेरे ख़ुदा तुम हो
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कश्ती है सुकूँ की मौजों में इतना ही सहारा काफ़ी है
मेरे लिए तो ऐ जान-ए-जहाँ बस नाम तुमहारा काफ़ी है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere