बरकतुल्लाह पेमी
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दोहा 28
तू मैं मैं तू एक हैं और न दूजा कोय
मैं तो कहना जब छुटे वही वही सब होय
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मन भटको चहुँ ओर तें आयो सरन तिहार
करुना कर के नाँव की करिए लाज मुरार
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लिखें सबई लीखें नहीं मोहन प्रान सहाय
अलख लखै कउ लाख मूँ लिखा लखा तो काय
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तन निर्मल कर बूझिए मन की अधिकै सीख
वहोवा मअ'कुम के भेद सों फिर फिर आपै देख
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तुम जानी कछु 'पेम' मग बातन बातन जाय
पंथ मीत को कठिन है खेलो फाग बनाय
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