अपनी इबादतों और आत्मिक अभ्यास पर नहीं, बल्कि उसकी रहमत पर भरोसा करो।
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कोई तब तक फ़क्र की मंज़िल नहीं पा सकता, जब तक वह देने को लेने पर तरजीह नहीं देता। सख़ावत यह नहीं है कि जिस के पास दौलत है वह ग़रीब को दे, बल्कि ये है कि जिस के पास कुछ भी नहीं है, वो अमीर को दे।
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ग़ुलामी ही बंदे की अस्ल आराईश है। जो ग़ुलामी छोड़ देता है, वह ख़ूबसूरती से महरूम हो जाता है।
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यह दुनिया एक ऐसा घर है, जो हमेशा ख़ुदा के ख़िलाफ़ गुनाह करने में लगा रहता है।
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वो अंधा है, जो कायनात के ज़रिए कायनात बनाने वाले को पहचानने की कोशिश करता है। काश! वह क़ायनात बनाने वाले के ज़रिए इस कायनात को पहचानता।
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