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बायज़ीद बस्तामी

804 - 874 | बस्ताम, ईरान

बायज़ीद बस्तामी

सूफ़ी उद्धरण 33

अगर आठों जन्नतें हमारे गोशे में जल्वागीर हों और दुनिया की सल्तनत हमारे हाथ में हो, तब भी हम उस एक आह को तर्क करेंगे, जो सहर के वक़्त दिल की गहराई से याद-ए--इलाही में शौक़ के मारे निकलती है।

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जब मैंने दुनिया को अपना दुश्मन जाना और रब की तरफ़ तवज्जोह की, तो उस की मुहब्बत ने मुझे इस क़दर घेर लिया कि मैं ख़ुद अपना दुश्मन बन गया।

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आरिफ़ उड़ता है और ज़ाहिद पैदल चलता है।

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मैं कहता हूँ कि ख़ुदा मेरी ज़ात का आईना है, क्योंकि मेरी ज़बान से वो बात करता है और अब मैं ख़ुद नहीं रहा।

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मुल्क एक खेती है और इंसाफ़ उस का पासबाँ हो तो, खेती उजड़ जाती है।

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