अगर आठों जन्नतें हमारे गोशे में जल्वागीर हों और दुनिया की सल्तनत हमारे हाथ में हो, तब भी हम उस एक आह को तर्क न करेंगे, जो सहर के वक़्त दिल की गहराई से याद-ए--इलाही में शौक़ के मारे निकलती है।
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जब मैंने दुनिया को अपना दुश्मन जाना और रब की तरफ़ तवज्जोह की, तो उस की मुहब्बत ने मुझे इस क़दर घेर लिया कि मैं ख़ुद अपना दुश्मन बन गया।
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मुल्क एक खेती है और इंसाफ़ उस का पासबाँ न हो तो, खेती उजड़ जाती है।
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आरिफ़ उड़ता है और ज़ाहिद पैदल चलता है।
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मैं कहता हूँ कि ख़ुदा मेरी ज़ात का आईना है, क्योंकि मेरी ज़बान से वो बात करता है और अब मैं ख़ुद नहीं रहा।
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