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बहज़ाद लखनवी

1900 - 1974 | लाहौर, पाकिस्तान

लखनऊ का मा’रूफ़ ना’त-गो शाइ’र

लखनऊ का मा’रूफ़ ना’त-गो शाइ’र

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
ज़रा और मुस्कुरा लूँ दिल-ओ-जाँ शिकार-ए-ग़म हैं

बहज़ाद लखनवी

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नय्यारा नूर

नूर जहां

ग़ुलाम फ़रीद साबरी

ज़ुलफ़िक़ार अली

साइमा जहां

'आशिक़ों का कुल सर-ओ-सामाँ मोहम्मद मुस्तफ़ा

'आशिक़ों का कुल सर-ओ-सामाँ मोहम्मद मुस्तफ़ा अज्ञात

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए नय्यारा नूर

तुम सिर्र-ए-'अयाँ मक्की मदनी तुम राज़-ए-निहाँ मक्की मदनी

तुम सिर्र-ए-'अयाँ मक्की मदनी तुम राज़-ए-निहाँ मक्की मदनी अज्ञात

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे अज्ञात

न तो तुम हरम से पूछो न तो उस गली से पूछो

न तो तुम हरम से पूछो न तो उस गली से पूछो लुतफ़ुल्लाह ख़ान

मुझे ये बताओ कहाँ तुम नहीं हो

मुझे ये बताओ कहाँ तुम नहीं हो शाहिद नियाज़ी

मदीने वाले आक़ा ये तो हसरत कम से कम निकले

मदीने वाले आक़ा ये तो हसरत कम से कम निकले हाजी फ़य्याज़ अहमद

मेरा का’बा-ए-तमन्ना दर-ए-पाक-ए-मुस्तफ़ाई

मेरा का’बा-ए-तमन्ना दर-ए-पाक-ए-मुस्तफ़ाई लुतफ़ुल्लाह ख़ान

है अरमान दिल का ख़ज़ीना ख़ज़ीना

है अरमान दिल का ख़ज़ीना ख़ज़ीना ज़मान ज़की ताजी

हम रौनक़-ए-हस्ती का सामान लुटा बैठे

हम रौनक़-ए-हस्ती का सामान लुटा बैठे हाजी महबूब अ'ली

हिज्र में भी बड़ा कैफ़ जीने में है

हिज्र में भी बड़ा कैफ़ जीने में है

शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

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