गुरबचन सिंह दयाल के अशआर
ख़ुदा गो ज़र्रे ज़र्रे से अयाँ है
मगर ज़र्रा यहाँ कुछ भी नहीं है
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जहाँ हो बिजलियों का ख़ौफ़ पैहम
सुकून-ए-आशियाँ कुछ भी नहीं है
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शोमी-ए-क़िस्मत कहें या ख़सलत-ए-इंसाँ इसे
आ के क़ाबिज़ बज़्म-ए-हस्ती पर ये मेहमाँ हो गया
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere