Sufinama
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जमाल

1568 - 1593

जमला तहाँ जाइये जाँ केहरी निवाण

सँभराइसि दुख्खड़ा माराइसि अप्पाण

नयन रंगीले कुच कठिन मधुर बयण पिक लाल

कामण चली गयंद गति सब बिधि वणी 'जमाल'

अलक लगी है पलक सै पलक लगी भौंनाल

चंदन चोकी खोल दै कब के खड़े 'जमाल'

या तन की भट्टी करूँ मन कूँ करूँ कलाल

नैणाँ का प्याल: करूँ भर भर पियो 'जमाल'

दुर्जन निंदत सजन कौं तालक नांहिन लाल

छार घसे ज्यों आरसी दूनीं जोति 'जमाल'

जमला ऐसी प्रीत कर जैसी निस अर चंद

चंदे बिन निस साँवली निस बिन चंदो मंद

बंसी बाजै लाल की गन गंधर्व बिहाल

ग्रह तजि तजि तहँ कुल वधु स्नवनन सुनत 'जमाल'

मुख ग्रीषम पावस नयन तन भीतर जड़काल

पिय बिन तिय तीन ऋतु कबहुँ मिटैं 'जमाल'

ससि कलंक खारो समुद्र कमलहिं कंटक नाल

ज्ञानी दुखी मुरख सुखी दईकूं बूझि 'जमाल'

शुतर गिर्यो भहराय के जब पहुँचियो काल

अल्प मृत्यु कूँ देखि कें जोगी भयो 'जमाल'

गुण के गाहक लख भए नैणा भए दलाल

धनी बसत नहिं बेचहिं भूले फिरे 'जमाल'

जब तरणपो मुझ्झयो पाय परत नित लाल

कर ग्रह सीस नवावती जोबन गरब 'जमाल'

अलक जु लागी पलक सूँ पलक रही तिहाँ लाल

खिड़की खोलि आवही सूरति याक 'जमाल'

जमला कपड़ा धोइए सत का साबुन लाय

बूँद ज़ लागी प्रेम की टूक टूक हो जाय

मनसा तो गाहक भए नैणा भए दलाल

बसत खसम बेचै नहीं बटै कहा 'जमाल'

ससि खंजण माणक कँवल कीर वदन एक डाल

भुजंग पुँछ तें डसत है निरखत डर्यों 'जमाल'

अब नहि जाउँ सनान को भूलि सखी उहि ताल

इक चकई अरु कमल कौं बहुत वियोग 'जमाल'

रे हितियारे अधरमी तुँ आवत लाल

जोबन अजुंरी नीर सम छिन घट जात 'जमाल'

जमला प्रीत सुजाण सें जे कर जाणै कोय

जैसा मेला निजर का तैसा सेज होय

सोना बया नीपजै मोती लगै डाल

रूप उधारा नाँ मिलै भूलै फिरौ 'जमाल'

नैणाँ का लडुवा करूँ कुच का करूँ अनार

सीस नाय आगे धरूँ लेवो चतर 'जमाल'

एक सखी ऐसे कह्यो वे आये घन लाल

उझकि बाल झुकि कैं लखै अति दुख भयो 'जमाल'

खोटे का को कहै धनी खोटे दाम हि लाल

सोई ता कौं आदरै जाके दाम 'जमाल'

दुस्सासन एंचन इचत भरी बसन की माल

चीर बधायो द्रोपदी रच्छा करी 'जमाल'

यो मन नीके लगत हो मोहत मो मन लाल

कहूँ कहा मोहन तुमैं पीत होत 'जमाल'

पिय फूले तैं हूँ हरी पिया हरैं हूँ डाल

पिया मो हु मो में पिया इक ह्वै रहे 'जमाल'

अरूझि रीझ रीझै नहीं होतनि मोही लाल

पिय आवनकी आस सौं लालहि भई 'जमाल'

मोर मुकुट कटि काछनी, मुरली सबद रसाल

आवत है बनि विमल कै मेरे लाल 'जमाल'

डगमग नयन सुसगमगे विमल सु लखे जु बाल

तसकर चितवनि स्याम की चित हर लियो 'जमाल'

जमला ऐसी प्रीत कर ज्यूँ बालक की माय

मन लै राखै पालणै तन पाणी कूँ जाय

जब जब मेरे चित्त चढ़ै, प्रीतम प्यारे लाल

उर तीखे करवत ज्यूँ बेधत हियो 'जमाल'

अलक जु लागी पलक पर पलक रही तिहँ लाल

प्रेम-कीर के नैन में नींद परै 'जमाल'

या तन की सार्रैं करूँ प्रीत जु पासे लाल

सतगुरु दाँव बताइया चोपर रमे 'जमाल'

राधे की बेसर बिचैं बनी अमोलक बाल

नन्दकुमार निरखत रहैं आठों पहर 'जमाल'

जमला प्रीत कीजियै काहू सों चित लाय

अलप मिलण बिछुड़न बहुत तड़फ तड़फ जिय जाय

तरवर पत्त निपत्त भयो फिर तपयो तत्काल

जोबन पत्त निपत्त भयो फिर पतयौ 'जमाल'

विधि बिधि कै सब विधि जपत कोऊ लहत लाल

सो विधि को विधि नंद घर खेलत आप 'जमाल'

नैना कहियत पनिगनी कहौ तुम्हाँरे लाल

डसै पिछै सबदन कछू लागत नांहि 'जमाल'

कर घूँघट जग मोहिये बहुत भुलाए लाल

दरसन जिनैं दिखाइयाँ दरसन जोग 'जमाल'

करज्यो गोर 'जमाल' की नगर कूप के मांय

मिर्ग-नैनी चपला फिरैं पडैं कुचन की छाँय

सज्जन एहा चाहिये जेहा तरवर ताल

फल भच्छत पानी पियत नाहिं करत 'जमाल'

काहू कै बस हौ वस सु काके लाल

बसन कौन के जात हो पलटैं भेष 'जमाल'

पूनम चाँद कसूँभ रँग नदी तीर द्रम डाल

रेत भींत भुज लिपणो थिर नहीं 'जमाल'

चित्र चतेरा जो करै रचि पचि सूरत बाल

वो चितवनि वो मुर चलँन क्यूँकर लखै 'जमाल'

प्रीत जो कीजै देह धर उत्तम कुल सुँ लाल

चकमक जुग जल में रहै अगन तजै 'जमाल'

जग सागर है अति गहर लहरि विषैं अति लाल

चढ़ि जिहाज़ अति नाम की उतरें पार 'जमाल'

जोबन आए गाहकी नैणाँ मिले दलाल

गाहक आए लेन कूँ बेचो कयूँ 'जमाल'

तिय ननदी पिय सासू सो कलह करी तत्काल

साँझ परत सूनो भवन बुझई दीप 'जमाल'

अबसि चैन-चित रैण-दिन भजहीं खगाधिपध्याय

सीता-पति-पद-पद्म-चह कह 'जमाल' गुण गाय

जमला ऐसी प्रीत कर जैसी केस कराय

कै काला कै ऊजला जब तब सिर सूँ जाय