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ख़लिश देहलवी

1935 | दिल्ली, भारत

ख़लिश देहलवी के अशआर

मेरी यक़ीं हो तो सितारों से पूछना

बे-ख़्वाब चाँदनी भी रही तेरी याद में

'ख़लिश' ये पूछता फिरता है आबशारों से

कि क्यों ये वादी-ए-गुल तेरी रहगुज़र हुई

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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