ख़लिश देहलवी के अशआर
'ख़लिश' ये पूछता फिरता है आबशारों से
कि क्यों ये वादी-ए-गुल तेरी रहगुज़र न हुई
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मेरी यक़ीं न हो तो सितारों से पूछना
बे-ख़्वाब चाँदनी भी रही तेरी याद में
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere