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महबूब वारसी गयावी

गया, भारत

महबूब वारसी गयावी के अशआर

दम तोड़ रहा है देख ज़रा आ’शिक़ है तिरा कुश्ता है तिरा

ऐ मोहनी सूरत वाले हसीं महबूब को यूँ बर्बाद न कर

कोशिश तो बहुत की मैं ने मगर क़िस्मत की न थी कुछ अपनी ख़बर

ले सब्र से काम दिल-ए-मुज़्तर जब दाद नहीं फ़रियाद न कर

अब दिल का है वीरान चमन वो गुल हैं कहाँ कैसा गुलशन

ठहरा है क़फ़स ही अपना वतन सय्याद मुझे आज़ाद न कर

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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