Sufinama
Muztar Khairabadi's Photo'

मुज़्तर ख़ैराबादी

1856 - 1927 | ग्वालियर, भारत

हिन्दुस्तान के मा’रूफ़ ख़ैराबादी शाइ’र और जाँ-निसार के वालिद

हिन्दुस्तान के मा’रूफ़ ख़ैराबादी शाइ’र और जाँ-निसार के वालिद

मुज़्तर ख़ैराबादी के दोहे

31
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

पी मोरा मन पीउ की पी दिन हैं मैं रैन

जैसे नजरिया एक है देखत के दो नैन

मैं खोटी हूँ तुम खरे खरे तुम्हारे काज

खोट खोट सब छाँट दो खरा बना दो आज

तन पाया तब मन मिला मन पाया तब पीउ

तन-मन दोनों पी के हैं पी का नाम है जीउ

तुम ही जगत-महराज हो और 'मुज़्तर' तुमरे दास

जिन हालन चाहो रखो पर रखना अपने पास

चित्त मोरा बे-चित्त किया मार के नैनाँ बान

मित्र बने तुम चित्र के चित्र किया क़ुर्बान

नैणा वही सराहिए जिन नैना बिच लाज

बड़े भए और बिस भरे तो आवन कौने काज

जब बिप्ता पड़ जात है छोड़ देत सब हाथ

देत अँधेरी रैन में कब परछाईं साथ

दर्शन जल की प्यास है कुछ भी नहीं है चाव

तुम जग-दाता बज रहे तो काम हमारे आओ

तन मीटे मन वार दे यही प्रीत की आन

जो अपना आपा तजे सो वा का दासी जान

मालिक ही के नाम की माला फेरत लोग

मालिक मेटे तब मिटे निपट बिपत का रोग

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

बोलिए