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पंडित शाएक़ वारसी

देवा, भारत

मुसन्निफ़, अदीब और उर्दू, संस्कृत ज़बान के शाइ’र

मुसन्निफ़, अदीब और उर्दू, संस्कृत ज़बान के शाइ’र

पंडित शाएक़ वारसी का परिचय

उपनाम : 'शाएक़'

मूल नाम : दींदार शाह

जन्म :वेस्ट बंगाल

पंडित दीनदार शाह वारसी की पैदाइश एक आ’ला ख़ानदान में ब-मक़ाम-ए- मालाबार या’नी मालवा में हुई। वो ज़ात के ब्रहमन थे। उनका क़दीम नाम किशोर राय था मगर लोग उन्हें पंडित जी कह कर पुकारते थे। पंडित जी शाइक़ तख़ल्लुस करते और संस्कृत ज़बान में दस्तरस रखते थे। उनकी इब्तिदाई ता’लीम भी इसी ज़बान में हुई थी। उन्होंने कई देश परदेस का भी सफ़र किया था। वो एक सय्याह फ़क़ीर थे। कहा जाता है कि पंडित जी पहले-पहल हिंदू-मज़हब के पैरोकार थे| बा’द में सूफ़ी रिवायतों के अमीन हुए और हाजी वा’रिस अ’ली शाह के दस्त-ए-हक़-परस्त पर मुरीद हुए। देवा ज़िला' बाराबंकी में पंडित का नाम शो’रा की फ़िहरिस्त में बड़ा ऊँचा है। वो सूफ़ी अदब के ज़िंदा-जावेद शाइ’र हैं। नस्र-ओ-नज़्म दोनों में उनकी तसानीफ़ प्रेम लीला, बक़ा-ए- वारिस, गुलज़ार-ए-इ’श्क़, तसर्रुफ़ात-ए-वारिस, लौह -ए-दरवेश, भजन-ए- शाइक़, तकबीर-ए- आ’शिक़ाँ वग़ैरा शोहरत की हामिल हैं। पंडित दीनदार शाह वारसी हाजी वारिस अ’ली शाह के मुरीद होने के बा’द बिल्कुल बदल से गए थे।

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