रज़ा फ़िरंगी महल्ली के अशआर
उ’म्र-भर याद-ए-दुर्र-ए-दंदाँ में मैं गिर्यां रहा
क़ब्र पर जुज़ दामन-ए-शबनम कोई चादर न हो
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क़ल्ब-ए-मोमिन आईना है ज़ात-ए-मोमिन का ‘रज़ा’
देखकर हैराँ उसे क्यों अ’क़्ल-ए-असकंदर ना हो
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तैरता है फूल बन कर बह्र-ए-ग़म में दिल मिरा
किस तरह डूबे वो कश्ती जिसमें कुछ लंगर न हो
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हिज्र के आलाम से छूटूं ये क़िस्मत में नहीं
मौत भी आने का गर वा’दा करे बावर ना हो
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उ’ज़्र कुछ मुझको नहीं क़ातिल तू बिस्मिल्लाह कर
सर ये हाज़िर है मगर एहसान मेरे सर न हो
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तैरता है फूल बन कर बह्र-ए-ग़म में दिल मिरा
किस तरह डूबे वो कश्ती जिसमें कुछ लंगर ना हो
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टैग : ग़म
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उड़ सकें बरसात में किस तरह जुगनू बे-शुमार
जोश-ए-गिर्या में शरर-अफ़शाँ जो दिल अक्सर ना हो
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टैग : गिर्या-ओ-ज़ारी
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere