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Sufinama
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सादिक़ लखनवी

सादिक़ लखनवी के अशआर

दिल फंसा कर ज़ुल्फ़ में ख़ुद है पशेमानी मुझे

दह्र में ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कहती है ज़िंदानी मुझे

जान का कुछ ख़ौफ़ जाँबाज़ान-ए-उल्फ़त को नहीं

आप दिखलाते हैं क्यों तेग़-ए-सफ़ाहानी मुझे

आतिश-ए-फ़ुर्क़त से ‘सादिक़’ आबला-तन हो गया

क़ब्र में रखना पस-ए-मुर्दन ब-आसानी मुझे

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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