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शैख़ हमीदुद्दीन नागौरी

1183 - 1274 | सवाली, भारत

शैख़ हमीदुद्दीन नागौरी

सूफ़ी उद्धरण 1

जब महबूब का कोई निशाँ बाक़ी रहे, तो तू भी बे-निशाँ हो जा। जैसे फूल की ख़ुशबू फूल में छिपी रहती है, वैसे ही महबूब में गुम हो जा और महबूब जैसा ही नज़र आ।

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