शैख़ हमीदुद्दीन नागौरी के सूफ़ी उद्धरण
जब महबूब का कोई निशाँ बाक़ी न रहे, तो तू भी बे-निशाँ हो जा। जैसे फूल की ख़ुशबू फूल में छिपी रहती है, वैसे ही महबूब में गुम हो जा और महबूब जैसा ही नज़र आ।
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere