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Sufinama
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सुलैमान वारसी

सुलैमान वारसी के अशआर

ख़ुद-साज़ी में मसरूफ़-ए-ख़ुदाई है 'सुलैमाँ'

दुनिया में कोई मर्द-ए-ख़ुदा-साज़ कहाँ है

क्यूँ दिल-ए-मुज़्तर हुए क्या वो तिरे नाले

साज़-ए-शिकस्तः तिरी आवाज़ कहाँ है

जी में आती है नए फ़ित्ने उठाते जाइए

दिल के ज़र्रे ख़ाक-ए-गुलशन में मिलाते जाइए

अब अपने तसव्वुर में उड़ा फिरता है गुलशन

तक़दीर-ए-असीरी पर पर्वाज़ कहाँ है

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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