सुलैमान वारसी के अशआर
ख़ुद-साज़ी में मसरूफ़-ए-ख़ुदाई है 'सुलैमाँ'
दुनिया में कोई मर्द-ए-ख़ुदा-साज़ कहाँ है
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क्यूँ ऐ दिल-ए-मुज़्तर हुए क्या वो तिरे नाले
ऐ साज़-ए-शिकस्तः तिरी आवाज़ कहाँ है
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जी में आती है नए फ़ित्ने उठाते जाइए
दिल के ज़र्रे ख़ाक-ए-गुलशन में मिलाते जाइए
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अब अपने तसव्वुर में उड़ा फिरता है गुलशन
तक़दीर-ए-असीरी पर पर्वाज़ कहाँ है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere